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Sermon on The Mount

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Yishu delivers the sermon on the mount and preached the message of the holy spirit in the world. God himself had come to the earth for this divine purpose.

Sermon on the Mount - Hindi Preaching 


sermon on the mount
sermon on the mount

पवित्र शास्त्र 
प्रभु यीशु के पहाड़ पर उपदेश के विषय में हम बात कर रहे हैं. इस संसार में प्रभु यीशु का आना संसार के दुखों का अंत और स्वर्ग के राज्य की स्थापना होना है. क्योकि यीशु ने बताया, स्वर्ग के राज्य के नियम क्या होते हैं. मनुष्यों को पवित्र जीवन जीना चाहिए. प्रभु यीशु ने भीड़ को प्रभु के धरती पर आने के विषय में विस्तार से बताया. 
 मती की पुस्तक के अध्याय 5, 6, और 7 में, "Sermon on The Mount"  का वर्णन है. इन तीनों अध्यायों में प्रभु हमें बताते हैं कि परमेश्वर के राज्य में हमे  कैसा जीवन मिलने वाला है. 



प्रभु यीशु कहते हैं, "मै इसलिए आया हूँ, ताकि सभी मनुष्यों को स्वर्ग के राज्य तक ले जाऊं." 


सभी लोगों की आत्माएं स्वर्ग के राज्य तक पहुंचने के लिए जन्मों संघर्ष करती रहती हैं. हम कहते हैं, हम अपने देश में निवास कर रहे हैं. लेकिन वास्तव में हमारा देश स्वर्ग है. हमें वहां तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए.



प्रभु यीशु कहते है, "हे स्वर्ग में रहने वाले परमेश्वर ! तेरा राज्य आये. तेरी मर्जी पूरी हो.'



प्रभु यीशु परमेश्वर के राज्य को यहां लाये हैं. उसने हमको पाप की परिभाषा बताई कि. लोग पाप रहे थे मगर उनको पता ही नही था कि वे पाप के चंगुल में फंसे हुए हैं. तरह-तरह की बुराइयां कर रहे हैं.



बाइबिल में लिखा है -



" भीड़ को देखकर प्रभु यीशु पहाड़ पर चढ़ गए और बैठ गए. उनके चेले उनके पास आये और यीशु उनको उपदेश देने लगा. उसने समझाया कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उनका जीवन किस प्रकार का होना चाहिए।"
यहां ये बात समझने के योग्य है कि मनुस्य जीवन जी रहा है, मगर अपने शरीर और अपने वातावरण का ही जीवन जी रहा है.


" धन्य है वे जो मन के दीन हैं क्योकि स्वर्ग का राज्य उनके लिए है. धन्य हैं वे लोग जो शोक करते हैं क्योकि उनको शान्ति मिलेगी. धन्य हैं वे लोग जो नम्र हैं क्योकि वे पृथ्वी के उत्तराधिकारी होंगे. धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे हैं क्योकि वे तृप्त किये जायेंगे. धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं क्योकि उन पर दया की जाएगी. धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योकि वे परमेश्वर को देखेंगे. धन्य हैं जो मेल कराने वाले हैं क्योकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे. धन्य हैं वे लोग जो धार्मिकता के कारण सताये जाते हैं क्योकि स्वर्ग का राज्य उन्ही का है. धन्य हो तुम जो लोग मेरे कारण तुम्हारी निंदा करे, तुम्हे यातना दे और झूठ बोलकर तुम्हारे सब प्रकार की बातें करें. आनंदित और मगन हों क्योकि स्वर्ग में तुम्हारा प्रतिफल महान है. उन्होंने तो उन नबियों को भी, जो तुमसे पहले हुए, उसी प्रकार सताया था."


क्या हम दीन हैं? मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि दींन (डाइनैंस)मानव बहुत कम होते है. ऊपर से सब दीन बनने का दिखावा करते हैं. लेकिन उनका मन दीन नहीं होता.



"धन्य हैं वे लोग जो शोक करते हैं क्योकि उनको शान्ति मिलेगी."



शोक दुनिया में फैला हुआ है. किसी का रिश्तेदार मर गया, किसी का दुर्घटना में हाथ टूट गया, किसी पर बीमारियों ने कब्जा कर रखा है, दुष्ट आत्माओं ने किसी को जकड रखा है. चारों तरफ शोक ही शोक है.


प्रभु यीशु कहते है, घबराओ मत तुमको शांति मिलेगी. शांति उन लोगों को मिलने वाली है जो दुनिया के लिए शोक करते हैं, जो लोग अपने पड़ोसियों की बिमारियों का शोक करते हैं जो औरों के दुखों का शोक करते हैं, दुसरो के बारे में सोचने वालों को जल्दी शान्ति के आशीष milneहैं. पवित्र आत्मा खुद आकर उनको शान्ति को शांति देने वाली है.



"धन्य हैं वे लोग जो नम्र हैं क्योकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे."



प्रभु यीशु उन सभी लोगो को धन्य कह रहे हैं जो लोग अपने जीवन में नम्र बनकर काम करते हैं. आज यदि किसी व्यक्ति के पास अपना घर नही है, या हो सकता है कि घर तो हो मगर कोई अन्य खेती भूमि न हो. पवित्र आत्मा बोलता है, तुमको इन बातों की चिंता करने की आवश्यकता ही नही है. स्वर्ग में उनका अधिकार पूरी पृथ्वी पर होगा. वे जिन चीजों का उपभोग करेंगे, वे स्वर्गीय होंगीं, उनके द्वारा किये जाने वाले हर काम में आनंद ही आनद होगा और वो आनंद स्वर्ग का आनंद होगा जहां परम पिता परमेश्वर रहता है.



'धन्य हैं वे लोग जो धरम के भूखे प्यासे हैं क्योकि वे तृप्त किये जायेंगे."



यीशु मसीह उन लोगों को धन्य कहते हैं जो  हर समय अपने मन में धर्म की चाह रखते हैं. अर्थात वे लोग जो धरम के मार्ग पर चलना चाहते हैं और धर्म के कार्य करते हैं. ऐसे लोग प्रभु यीशु को बहुत प्यारे होते हैं. यहां पर धरम के भूखे होने मतलब किसी एक विशेष धर्म से या किसी समुदाय से नहीं है बल्कि उस मानव धरम से है जो सारे संसार के लोगों का धरम है. पवित्रता का धर्म। पवित्र आत्मा कहती है, तू अपने शरीर के धर्म के बारे में मत सोच, तू अपने देश के धर्म के बारे में मत सोच, तू पुरे संसार के आत्माओं के धर्म के बारे में सोच. संसार के फायदे की सोचने से तेरे अपने धर्म का तुझे प्रतिफल मिलेगा। तुम्हारी आत्मा के अंदर जो धर्म की प्यास है वह तृप्त होगी.



"धन्य हैं वे लोग जो दयावन्त हैं क्योकि उन पर दया की जाएगी."



जीवन में दयावन्त होना आवश्यक है. सभी व्यक्ति दया का पालन करते हुए जीवन में सच के मार्ग पर चलें. दया आपके अंदर कितनी है, इस बात से आपके धर्म की गहराई का पता चलता है. सच्चे धर्मी पुरुषो में दया का धर्म होता है. इसीलिए स्वर्ग का राज्य की कामना करने वाले सभी लोगों में दया की भावना होने के गुण को यीशु ने धन्यता कहा है.



"धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योकि वे अपने मन से परमेश्वर को देखेंगे."




यीशु कहता है, जिन लोगों का मन शुद्ध है वे परमेश्वर को देखने वाले हैं. आराधनालयों में जाने वाले लोगो का अगर मन सुदध नहीं है तो परमेश्वर उनको नही दिखेगा. उनके पाप धुले हुए नहीं हैं और उनके पाप प्रभु के पास जाने वाले रास्ते को रोक लेंगे. यदि मनुष्य प्रभु की महिमा के दर्शन करने हैं तो उसके लिए अपने मन को शुद्ध करना होगा. शुद्ध मन से ही प्रभु के दर्शन होंगे.


"धन्य हैं वे लोग जो मेल कराने वाले हैं क्योकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे."



यीशु ने हमारे बीच में जन्म लिया. धरती पर किसी को नहीं पता था कि  सच्चा परमेश्वर कौन है, कैसा है, कहाँ रहता है, ये सारी बातें हमें यीशु ने बतायी. सच्चे स्वर्ग में रहने वाले परमेश्वर के साथ हम सभी मनुष्यों का मेल करवाया। तो इस तरह से यीशु परमेश्वर और हमारे बीच में मेल कराने वाला बन गया. वह परमेश्वर का पुत्र कहलाया गया. 


ठीक इसी प्रकार से हमें भी मेल कराने वाले बनना है. यदि हम सभी मिलकर प्रभु यीशु का सुसमाचार लोगों तक पहुचायें, उसकी पवित्रता के विषय में दुनिया में प्रचार करें तो हम भी मेल कराने वाले बन जायेंगे. हम भी परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे. स्वर्ग का आनंद परमेश्वर के पुत्रों के लिए है.



"धन्य वे हैं जो धर्म के कारण सताये जाते हैं,क्योकि स्वर्ग का राज्य उनका है."



सच्चे धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोग जब प्रभु यीशु की आराधना करते हुए पवित्रता के कार्य करते हैं, उसी समय अन्य लोग उनकी बुराई करते हैं. उनको अनेक प्रकार के आरोपों में उलझाते हैं, उनके शरीर को अनेक यातनाएं देते हैं. विश्वासी लोग किसी को परेशान नहीं करते, लेकिन उनको परेशान किया जाता है. उनके खिलाफ षड़यंत्र रचे जाते हैं. उनको यीशु के रास्ते पर चलने से रोकने के लिए तरकीब सोची जाती हैं. लेकिन विश्वासी लोग इस प्रकार की बातों पर आनंदित होते हैं. उनको भरपूर खुशी मिलती है. क्योकि वे जानते हैं कि धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोग सताये जाते हैं और स्वर्ग के राज्य में उनका स्वागत होता है.




"धन्य हो तुम जो लोग मेरे कारण लोग तुम्हारी निंदा करें, लोग तुमको यातना दे और झूठ बोलकर तुम्हारे सब प्रकार की बातें करें. आनंदित और मग्न हो क्योकि स्वर्ग में तुम्हारा प्रतिफल महान है."




प्रभु यीशु हमें सन्देश दे रहे है कि मनुष्य को अगर मेरे कारण, निन्दाओं का सामना करना पड़े, उसको दुख सहने पड़ें और उसको यातना मिले, तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसे विश्वासियों की परीक्षा होने पर उनको स्वर्ग में प्रतिफल मिलता है. उनको तो मन से आनंदित रहना चाहिए और खुशियों में मग्न रहना चाहिए. शरीर की पीड़ा तुच्छ होगी, लेकिन स्वर्ग का आनंद और प्रतिफल अनमोल होगा.

 "तुम पृथ्वी के नमक हो."




किसी वस्तु को ख़राब होने से बचाने के लिए नमक में रख दिया जाता है. नमक के द्वारा स्वाद बनाया जाता है. नमक जीवाणुओं से रक्षा करता है. यीशु मसीह कहते है, मेरे विश्वासियों ! तुम पृथ्वी के नमक हो क्योकि बुराई तुम्हारे पास नहीं आ सकती, तुम अन्य लोगो के जीवन को सवादिस्ट बना देते हो. जिस प्रकार नमक दूसरे द्रव्यों में, भोजन आदि में पूरा घुल मिल जाता है और उनको नमकमय बना देता है, उसी प्रकार से विश्वासी लोग जहां जाते हैं वहीं पर अन्य लोगो के मन को प्रभु की भक्ति में घोल देते हैं क्योकि उनमे नमक का गुण है. वे दूसरे लोगों के जीवन में स्वाद पैदा कर देते हैं.

इसलिए यीशु मसीह अपने भक्तों को पृथ्वी का नमक कहते हैं.



"तुम जगत की ज्योति हो."




तुम्हारे पास ज्ञान की ज्योति होनी चाहिए. रोशनी की एक झलक से अन्धेरा दूर हो जाता है. यीशु के भक्तों को पूरी दुनिया में ज्ञान का प्रचार करने का काम  है. रोशनी अन्धकार में रास्ता दिखाती है. हमें ज्ञान की ज्योति बनकर लोगों को रास्ता दिखाना है. जितना अधिक यीशु के नाम का प्रचार होगा, उतना ही अधिक यीशु के भक्तों के ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जायेगा. यीशु के रूप में हमको जो ज्ञान की ज्योति मिली है, हमें उस ज्योति को अन्य लोगों को दिखा देना है. हमारे अंदर यीशु के ज्ञान का प्रकाश इतना बढ़ाना है ताकि लोगों को अपने आप राह दिखाई दे. उसको फैलाने से हमारे अंदर दिव्यता आएगी.


तुमको सत्य दूसरों को दिखाना है, तुम्हे  दूसरों को राह दिखाना है. तुम्हारा उजाला मनुष्यों के आगे इतना चमके कि वे तेरे भले कामों को देखकर तुम्हारे स्वर्ग के पिता की जय करें.


हमें प्रभु यीशु के नाम का प्रचार करना है, हमारे नाम या काम का नहीं. हम भले काम करें और लोग हमको जानें. लोग परमेश्वर को जानें, ये ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए. हमारे सभी भले कामों से परमेश्वर की महिमा होनी चाहिए.


"मैं व्यवस्था को तोड़ने नहीं आया हूँ, मेँ व्यवस्था को पूरी करने आया हूँ."


पद 17 में ये बात लिखी हुई है कि वहाँ के आराधनालयों और मंदिरों में पुजारी और धरम गुरु यीशु पर धर्म, रीती-रिवाजों को तोड़ने का झूठा इल्जाम लगाने लगे. जब तक पृथ्वी और आकाश अस्तित्व में हैं, परमेश्वर के द्वारा बताया हुआ एक-एक वचन पूरा होगा। 

हमें परमेश्वर के द्वारा बताये हुए वचनो को मन से स्वीकार लेना है, अपनी आत्मा में धारण कर लेना है. 


"यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीशियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी भी नही जा सकोगे।"


हमारी मुख्य मंजिल है - परमेश्वर का घर. परमेश्वर का घर स्वर्ग में है. फ़रिशी लोग मंदिरो में बैठने वाले उपवास आदि करने वाले लोग हुआ करते थे. लेकिन वास्तव में ये धर्म की दिखावा मात्र करने वाले होते थे. दूसरे लोगों को दान करने का दिखावा करना, उपवास करने का दिखावा करना, औरो को दिखाकर ग्रंथों का अध्धयन करना, ये सब केवल बाहरी धार्मिकता के लक्षण हैं. 

परमेश्वर के वचनों पर चलने के लिए, अधिक दान देने की कोई जरूरत नहीं है, यदि कोई मनुष्य धन के मामले में गरीब है तथा परमेश्वर के वचनों पर चलता है तो वो बड़ा दानी है. यदि किसी का शरीर कमजोर है, वो उपवास नहीं रख सकता, उसके मन में परमेश्वर के वचन निरंतर चल रहें हैं तो वह धर्मी है. 

फरीसियों का कथन है कि अगर कोई ह्त्या करेगा तो दंड पायेगा. वे मनुष्य को शारीरिक दंड से बचाने के लिए हत्या के अपराध को करने मना करते हैं.

लेकिन प्रभु यीशु कहता है, ह्त्या करना महा पाप है और यह पाप क्रोध,  जलन, घृणा, इन भावनाओं के उत्पन्न होने के कारण होते हैं. इसलिए क्रोध मत करो. क्रोध करना अपराध है. घृणा अपराध है. उन भावनाओं को अपने मन में रखना पाप है, जिस कारण  हत्या करने के विचार मन में आते हैं,



 "अपनी धार्मिकता को पवित्र बनाओ।"



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